शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

उन दिनों

उन दिनों हम खूब बातें किया करते थे
बातों के उड़नखटोले
हवा के इशारे पर चलते थे
उनकी अपनी कोई गति ,कोई दिशा नहीं थी
हवा के एक झोंके पर वे पेड़ की सबसे ऊपर की
फुनगी पर जा बैठतीं
तो कभी , बारिश की बूंदों के साथ
मिट्टी के ठीक नीचे बेतरतीब फैली
घास की जड़ों में उलझ जातीं
बातें उलझी हुई , गुत्थमगुत्था ,बेतरतीब !!!!!
जिनका न कोई आदि था न कोई अंत
समय की बाधा से परे , बिन टूटे
बातों की ये लडियां चलती थीं सिलसिलेवार
अभीव्यक्ति के उन चमत्कारी तरीकों से
लबरेज़ थे हम उन दिनों
जब हर दूसरी बात पर
सभी चौंक जाया करते थे ,ऑंखें
विस्मय से खुली रह जाती थीं सबकी
बातें, ऎसी सटीक की न चाहते हुए भी
विश्वास कर लेते थे सभी उन बातों पर
हमने सुना था उन दिनों अपने बड़ों से , की
ऑंखें भी करती हैं बातें ,और
खूब हँसे थे हम उस समय
इस तरह बात करने का प्रयास करते - करते
!
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!
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!
!
सब कोरी बातें हैं ! एकदम गप्प
जो मुझे पता लगा अब
शायद ! बड़ा होकर , की
बड़ा होते ही ख़त्म हो जाती हैं बातें सारी
और ऑंखें खुली रह जाती हैं , फटी - फटी

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